लघु कथा: “बेघर” – कथाकार: सुरेशचन्द्र शुक्ल, ‘शरद आलोक’

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जब भी द्वार पर झाड़ू लगाने की आवाज आती तो मैं घर से बाहर निकल आता. हाथ में झाड़ू लिए भैरवी को एक टक देखने लगता।  जैसे-जैसे मैं पास आने की कोशिश करता वह मुझे देखकर और तेजी से झाड़ू लगाने लगती और धूल भी तेजी से चारो तरफ  फैलने लगती।  और मैं रुक जाता। भैरवी कहती बाबूजी मेरे पास नहीं आना. वह शायद मेरे बढ़ते आकर्षण को जान गयी थी. वह नहीं चाहती थी  कि कोई बवाल खड़ा हो. 

दादी को पड़ोसियों से भनक लग गयी कि मैं झाड़ू लगाने वाली भैरवी से बाते करता हूँ.

एक दिन दादी खुले आम सभी को सुनाते हुए मुझे सम्बोधित करते हुए कहा अगर तुम इस भैरवी को छुओगे भी तो मैं तुम्हे घर से निकाल दूंगी।

जब दादी मंदिर गयी थी तो मैंने भैरवी को अपनी चाय पीने को कहा. बहुत कहने पर बहुत मुश्किल से भैरवी  घर के बाहर खड़े रहकर चाय पीने के लिए तैयार  हो गयी. 

जब वह चाय पीकर मुझे प्याली वापस दे रही थी कि दादी वापस आ धमकी और उसने देख लिया।

फिर क्या कहना था  दादी आग बबूला हो गयी. 

दादी ने घर जाकर मेरा गुस्से से बैग फेककर कहा कि जाओ अब इसे जिंदगी भर छुओ पर इस घर में तुम्हारा गुजारा नहीं।”

बैग लेकर मैं भैरवी के पास आ गया.

भैरवी हंसी और कहा कि मैं भी तुम्हें घर में नहीं रख सकती।

मैंने प्यार से कहा मैं बेघर ही सही पर मैं तुम्हें अब छू तो सकता हूँ. साथ-साथ बैठकर चाय तो पी सकता हूँ. 

भारत में मोदी साम्राज्य – चार प्रदेशों में भाजपा की सरकार। उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी ने बहुत अच्छी शुरूआत की।-Suresh Chandra Shukla

Modi-parti BJP har vunnet i Delstatsvalget i fire av fem delstater i India. I Punjab har vunnet Congress, men i  Manipur, Goa, Uttarakhand og i Uttar Pradesh har vunnet BJP. Aditynath Yogis tale den 25. mars i Gorakhpur i India. एक राज्य पंजाब में में कांग्रेस जीती जहाँ मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और आम आदमी पार्टी वहां पहली बार विपक्ष की पार्टी बनी और विपक्ष के नेता श्री फुल्का हैं. बाकी चारो राज्यों में भारतीय जनता पार्टी जीती  है. उत्तराखंड में श्री तिवेंद्र सिंह रावत उत्तर  प्रदेश में आदित्यनाथ योगी, गोवा में मनोहर पार्रिकर और मणिपुर  बिरेन सिंह मुख्यमंत्री चुने गए हैं.

भारत में मोदी साम्राज्य – चार प्रदेशों में भाजपा की सरकार। उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ योगी ने बहुत अच्छी शुरूआत की।-Suresh Chandra Shukla
गोरखपुर में 25 मार्च 2017 को योगी जी का भाषण:

Photo: Curtsey IANS_PIB

विकास सबका होगा लेकिन तुष्टिकरण किसी का नहीं होगा : गोरखपुर में सीएम आदित्‍यनाथ योगी
गोरखपुर: उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री का पद संभालने के बाद पहली बार योगी आदित्‍यनाथ गोरखपुर पहुंचे जहां उनका भव्‍य स्‍वागत किया गया. यहां लोगों को संबोधित करते हुए उन्‍होनें कहा, ‘य‍ह नागरिक अभिनंदन मेरा नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ जनता का अभिनंदन है जिसने भारतीय जनता पार्टी और दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता इस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर और बीजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह की रणनीति के अंतरगत बीजेपी को यूपी में प्रचंड बहुमत दिया है, इसके लिए मैं यूपी की 22 करोड़ जनता का अभिनंनदन करता हूं.’ उन्‍होंने कहा कि हम सबके सामने प्रधानमंत्री और बीजेपी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष और बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने बहुत बड़ी जिम्‍मेदारी दी है और वह जिम्‍मेदारी है कि प्रधानमंत्री के सपनों के अनुरूप एवं अन्‍य बीजेपी शासित राज्‍यों की तरह ही उत्तर प्रदेश की जनता तक भी सरकार की हर योजना का लाभ पहुंचे. पढ़ें सीएम योगी ने और क्‍या कहा…

– हमें उन सपनों को साकार करना है जिससे उत्तर प्रदेश की जनता आज तक वंचित थी
– यूपी में महिलाओं, युवाओं और व्‍यापारियों के बीच व्‍याप्‍त असुरक्षा का माहौल खत्‍म करना है
– पीएम की एक ही चिंता थी की यूपी का भाग्‍योदय कैसे होगा
– हम सबके सामने प्रधानमंत्री आदर्श हैं
– गोरखपुर विकास से वंचित था और गोरखपुर को पहली बार विकास क्‍या होता है यह तब पता चला जब खुद प्रधानमंत्री ने यहां फर्टिलाइजर उद्योग और उएम्‍स की आधारशिला खुद रखी
– जनता ने जो जिम्‍मेदारी दी है वो केवल एक पद नहीं है बल्कि यह हमें दिखाता है कि उत्तर प्रदेश की 22 करोड़ जनता के प्रति हमारा क्‍या कर्तव्‍य होना चाहिए
– विकास सबका होगा लेकिन तुष्टिकरण किसी का नहीं होगा
– यूपी का कोई व्‍यक्ति उपेक्षित महसूस नहीं करेगा
– यूपी में भ्रष्‍टाचार मुक्‍त शासन होगा
– यूपी में गुंडाराज समाप्‍त होगा
– अराजकता के लिए इस व्‍यवस्‍था में कोई स्‍थान नहीं होगा
– यूपी में सभी सड़कें गड्ढा मुक्‍त होंगी
– यूपी के विकास के लिए मजबूती से काम करेंगे
– कैलाश मानसरोवर यात्रा करने वालों को एक लाख का अनुदान मिलेगा
– कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए भवन का निर्माण होगा
– कानून का राज स्‍थापित करने में सबका सहयोग जरूरी
– बीजेपी की बड़ी विजय, जोश में होश ना खोएं
– किसी को कानून अपने हाथ में नहीं लेना है
– पीएम ने यूपी विकास की जिम्‍मेदारी दी है
– यूपी सबका साबका साथ सबका विकास की राह पर चलेगा

Curtsey:NDTV

विदेशी माल सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

विदेशी माल

सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

देसी बनाम विदेशी की चर्चा ज़ोरों पर थी। अचानक देशभक्ति को देसी और विदेशी के बीच बाट दिया

गया। जब से पिताजी ने अवकाश प्राप्त किया है कोई न कोई मुद्दा उठा लेते हैं और अम्मा से ऐसे

उलझ जाते हैं की जैसे वह ही मुद्दे के केंद्र में हैं।

‘अम्मा ने जब पूछा, क्यों आसमान सर पर उठाए हुए हो?’

‘अरे भाग्यवान, तुम्हारा बेटा मोबाइल फोन की रट लगाये है। और ये मोबाइल फोन विदेश के बने हैं।

विदेशी चीजें हमें पसंद नहीं।‘

‘चलो अच्छा है कि तुम भी विदेशी वीवी की फरमाइश नहीं करते।‘ अम्मा ने पिताजी से तंज़ करते हुए

कहा।

‘तुम हर बात को हवा बना देती हो, चाहे जितनी गंभीर बात क्यों न हो। जानती हो इस बार दीवाली में

पड़ाके नहीं लेने हैं ये सारे पड़ाके, आतिशबाज़ी विदेशी है। ये चीन के बने होते हैं।‘

‘देखो जी, बा’हिष्कार करना है तो सभी विदेशी चीजों का करो। और खुद भी वह सब बनाना शुरू करो जो

विदेशी बनाते हैं।‘ पत्नी ने नहले पर दहला दे दिया था। पिताजी ने आव न देखा ताव और उन्होने कहा,

‘ हाँ-हाँ, लो आज से मैं घड़ी नहीं पहनूंगा। यह घड़ी विदेशी है और यह चश्मा अभी नहीं उतारूँगा जब

तक भारतीय फ्रेम वाला चश्मा ना बनवा लूँ।‘, कहकर पिताजी कुछ चिंतित दिखे जैसे कहावत है कि नाई

के बाल सामने आते हैं।

अम्मा ने मुझे आवाज दी, ‘सुनो शरद! खबरदार! आज से घर में विदेशी चीजों का प्रयोग नहीं होगा। तुम

भी विदेशी चीजें यहाँ लाकर जमा करो। तुम्हारे पिताजी ने विदेशी वस्तुओं के खिलाफ असहयोग आंदोलन

चला रखा है।‘

‘हाँ-हाँ, ठीक है अम्मा।‘ कहकर मैंने भी अपना थैला, लैपटाप मेज पर रख दिया। मन ही मन मेरे मुख से

हंसी निकालने को बेताब थी। पर पिताजी के असहयोग आंदोलन का हिस्सा बन गया था।

अब बारी आई मेरे बहन माधवी की। माधवी बड़े तैश में थी। उसने अपना प्यारा चश्माँ, जूते और बेल्ट

मेज पर जमा कर दिये और सर झुकाकर खड़ी हो गई।

अम्मा ने पूछा, ‘क्या बात है? मुंह लटकाए क्यों खड़ी हो?’

मेरी बहन माधवी कुछ न बोली। मैं भाँप गया कि क्या बात है? माधवी माडलिंग करती है और उसने

विदेशी पोशाक पहन रखी थी। माँ ने पूछा बता बेटी क्या बात है। पिताजी के विदेशी सामान के बाहिष्कार

में भाग लेने में कोई अड़चन है?’,

मैंने कहा ‘माँ! यह क्या बतायेगी, मैं बताता हूँ। पिताजी का विदेशी सामान के बाहिष्कार का आंदोलन

हमको नंगा करके रहेगा।‘

‘पिताजी नंगे होने वाले नहीं, बोल बेटा क्या बात है?’ माँ ने पूछा।

‘माँ तुम्हारी बेटी यानि मेरी बहन ने विदेशी पोशाक जो पहन रखी है। वह नंगी हो जायेगी माँ। घर की

ईज्जत?’ और ‘माँ –‘ मैं कुछ बोलता कि माँ बीच में ही बोल पड़ीं,

‘मैं तो कहती हूँ अब विदेशी माल के बाहिष्कार की बात छोड़ो अपनी ईज्जत बचाने की बात सोचो?’

पिताजी चुपचाप बैठे तमाशा देख रहे थे और मानो उनका मौन ही सबसे सुंदर जवाब था।

ई-मेल:

suresh@shukla.no

speil.nett@gmail.com

बृजमोहन ने सभी को मोह लिया (संस्मरण) – सुरेशचन्द्र शुक्ल suresh chandra shukla

बृजमोहन ने सभी को मोह लिया (संस्मरण) – सुरेशचन्द्र शुक्ल suresh chandra shukla
(मेरे पिताजी बृजमोहनलाल शुक्ल)

(मुझे संस्मरण लिखने के लिए दो लोगों ने बहुत जोर दिया दोनों ही साहित्य और आलोचना में जाने माने नाम हैं. ये नाम हैं डॉ कमल किशोर गोयनका और डॉ गिरिराज शरण अग्रवाल। इसी के साथ यह भी शायद महत्वपूर्ण हो कि ओस्लो में मेरे  बियरके के टाउन मेयर ने मुझपर पुस्तक लिखी है जो उन्होंने मेरे साक्षात्कार लेकर लिखी है. जो संस्मरण मैंने यहाँ ब्लॉग पर लिखने शुरू किये हैं वह शुरुआत है और दूसरों की राय से और स्वयं भी संवर्धन करने में आसानी होगी।)

जब मैं कक्षा नौ में रस्तोगी कालेज ऐशबाग़, लखनऊ में पढ़ता था  सन् १९६९ में मेरी कविता अखबार में  प्रकाशित हुई तो पिता जी ने उस अखबार को अपने मित्र मिश्रा जी को पढ़ाया और खुश हुए. अपने मोहल्ले में आयोजित होली के एक कार्यक्रम में उन्होंने जब मुझे कैरिकेचर करते और कविता पाठ करते सुना तो उन्होंने मेरी माताजी को खुशी व्यक्त करते बताया और शंका व्यक्त की कि कहीं सुरेश कलाकार न बन जाये फिर क्या होगा?  इसके साथ ही वह मेरे घूमने और सिनेमा देखने की रूचि से थोड़ा परेशान रहते थे जिसे मैं बहुत बाद में जान सका था.
आइये मेरे पिताश्री जो इस दुनिया को बहुत पहले ही सन् १९९२ में छोड़कर चले गए थे, आइये इस संस्मरण में उनके बारे में कुछ जानें।

मेरे पिता बृजमोहनलाल शुक्ल को जैसा मैंने देखा 

हाजिर जवाब मेरे पिता से जब मेरे बी ए में मेरे मित्र रमेश कुमार ने पूछा,
“चाचा जी आप नशा करते हैं आप भांग खाते हैं.” पिताजी ने जवाब दिया, ” जब भतीजे पूरी पूरी बोतल (शराब) उड़ा जाते हैं तो चाचाजी तो मामूली नशा करते हैं.”

मैंने डी  ए वी  कालेज से इंटरमीडिएट कालेज लखनऊ से इंटर पास किया और  बी एस एन वी डिग्री कालेज से बी ए किया था. दोनों ही विद्यालय में छात्रसंघ के चुनाव भी लड़े थे. मेरे सहपाठी जो चुनाव में मेरे प्रतिद्वंदी थे उन्होंने मेरे घर कुछ अपने दबंग मित्रों को मुझे चुनाव में न लड़ने की हिदायत देने के लिए भेजा था. वे तीन लोग थे. उनमें से एक ने कहा कि आप अपने बेटे को चुनाव लड़ने से मना  कर दीजिये नहीं तो वह घर वापस नहीं आयेगा। मेरे पिताजी ने उनसे बातचीत की और उन्हें शांत कर चाय पिलाकर भेजा।

अपने समाज में किसी आम आदमी का नेता बनना किसी नेता और राजनैतिक पार्टियों के कार्यकर्ताओं को नहीं सुहाता है. वे लोग रुकावट खड़ी करते रहते थे. यह मैंने अपने युवावस्था में ही जान लिया था. मेरे पिताजी मेरे छात्रनेता बनने के खिलाफ नहीं थे पर मुझे नौकरी और पढ़ाई में रुकावट आये बिना यह सब करना होता था। कक्षा दस में जब था तो मेरी नौकरी मेरे पिता और उनके मित्र श्री सत्य नारायण त्रिपाठी जी की कृपा से लग गयी थी.  रेलवे में लग गयी थी.

मुझे यह जानकार बहुत अजीब लगा था अपनी माँ से यह जानकर कि जब मैं तीन वर्ष का था अपने ननिहाल में था और बहुत गम्भीर रूप से बीमार पड़ा था. बड़ी चेचक भी निकली थी. तब मेरे पिता कभी भी मुझे और मेरी माँ को देखने नहीं आये थे. पूरे जीवन में वह एक बार ही मेरे स्कूल गए थे जब मेरा प्रवेष कक्षा नौ में होना था.

उन्नाव में जन्म और लखनऊ में पूरा जीवन बिताया

मेरे  पिताजी का पूरा नाम डॉ बृजमोहनलाल शुक्ल है जो अंग्रेजी में अपना नाम बी एम लाल लिखते थे.
उनका जन्म १९—- को मवैयामाफी गाँव, थाना अचलगंज और पोस्ट आफिस बेथर, उन्नाव जिले में हुआ था और मृत्यु लखनऊ में          १९९२ को हुयी थी. लखनऊ में पहले चित्ताखेड़ा और फिर ३०/८ एवं ४१/३ पुरानी  लेबर कालोनी, ऐशबाग में और अंत में अपनी मृत्यु तक ८-मोतीझील ऐशबाग रोड, लखनऊ में रहते थे.
लम्बा कद, बड़ी आँखें, आकर्षक चेहरा, सांवला रंग, बातूनी (बातचीत करना पसंद करने वाले) धैर्य और खाने और पहनने में शौक़ीन  मेरे पिता को आर्थिक  स्थितियों ने सादगी में रहने के लिए मजबूर किया था. बचपन में मैंने देखा कि उन्हें हैट और ओवर कोट पहनने का शौख था परन्तु पिता को आर्थिक समस्याओं ने मजबूर किया आम कपडे पहनने को.  बाद में कुर्ता धोती और सदरी पहनते रहे और केवल एक कोट को बरसों पहनकर गुजारा किया।

भाई-बहनों में सबसे बड़े
वह अपने भाई बहनों में सबसे बड़े थे.  उनसे छोटे क्रम से: कृष्ण गोपाल (साधुओं की संगत के कारण वह घर पर नहीं रहते थे और कृष्ण गोपाल चाचा पता नहीं जीवित हैं कि नहीं), रामरती (बुआ), स्व गोदावरी (बुआ), राम गोपाल (चाचा जो सुल्तानपुर नगर में सिविल लाइन्स में रहते हैं.) सावित्री (बुआ मुम्बई में रहती हैं) और कृष्णा (बुआ रायबरेली में ) रहती हैं.
चित्र में बृजमोहन लाल  जी अपनी पोती संगीता के साथ सन १९८० में 

मेरे संबंधियों की नजर मेंं पिताजी

वह हर काम में निपुण थे : मेरी बड़ी बुआ रामरती जी ने बताया, “बड़े भैया मुझसे और लल्ला भैया (कृष्ण गोपाल शुक्ल) से बड़े थे. हम सभी साथ-साथ खेलते थे. वह शांत स्वभाव के थे. अपने भाई बहनों से प्रेमभाव रखते थे. वह मिलनसार थे और हर काम में निपुण थे.” बड़ी बुआ कुछ विचार करती हुई कहती हैं, “बड़े भैया चाहते थे कि हम सभी लोग पास-पास रहें। इसीलिए उन्होंने आवास-विकास में चार-पांच प्लाट देखे थे. वह चाहते थे कि हम, राम गोपाल (मेरे चाचा) और अन्य परिवारजनों के अपने घर हो और वह भी पास-पास हों. मृत्यु के लगभग छः-सात महीने पहले उन्होंने कहा था कि तुम्हारे लिए प्लाट देखा है. हम प्लाट देखने नहीं गये. रामगोपाल को सावित्री की शादी में लखनऊ आकर प्लाट देखने को कहा था पर वह नहीं आ सके थे. काश उनका यह सपना पूरा होता और परिवारजन पास-पास रहते”.
मेरी बड़ी बहन आशा तिवारी कहती हैं,” सुरेश! पिताजी बहुत सीधे थे कोई चालाकी उनमें नहीं थी. जो भी कार्य करते थे किसी से छिपाते नहीं थे. वह खाने-पीने के बहुत शौक़ीन थे. एक बार की बात है पिताजी को बोनस मिला तो माताजी से कहने लगे कि उनके लिए जेवर बनवा देंगे। पिताजी के मित्र श्री मिश्रा जी दारु गोदाम नाम के मोहल्ले ऐशबाग में रहते थे और श्री हनुमान जी के मंदिर के बगल में कोयला और राख का व्यापार करते थे,  मिश्रा जी ने राय दी कि आपके पास जगह है और आप क्यों न पांच छ: ट्रक कोयला गिरवा  दें और कोयला और राख को अलग  करवाकर लाभ उठायें। मेरी माँ ने मिश्र जी का समर्थन किया।  पिताजी ने ८ -मोतीझील ऐशबाग, लखनऊ मेंं पाँच ट्रक राख-कोयले के गिरवा दिये।  मेरी माँ कोयला-बीनकर कोयला-राख बेचकर हमारा सभी का खर्च चलाने मेन पिताजी की मदद करने लगीं और उसी से घर बनवाया।  पिताजीने घर चलाने के लिए कर्ज ले रखा था।  घर का खर्च चलाने मेंं काफी मुश्किलें अाती थी.
मुझसे बड़े भाई श्री रमेश चन्द्र शुक्ल अपने पिता के बारे मेंं कहते हैं, “मेरे पिताजी सभी का भला करते थे. उन्होंने गांधी मेडिकल हाल भी निशुल्क सेवा के लिए ही खोला था. उनमें बहुत सेवा भाव था. वह रुपये पैसे से और अपना समय देकर भी अपने संबंधों का इस्तेमाल करके  किसी बीमार को अस्पत्ताल मेंं  भर्ती करवाते, उसे  दवा दिलवाना अादि  से भी सहायता करते थे. अाखिरी समय में बहुत अस्वस्थ  होने से हम सभी बहुत परेशान थे. मैं  उनके अंतिम वर्षों मेंं उनके साथ  रहा था. ऐशबाग, लखनऊ  मेंं स्तर के अच्छे  डॉक्टर और क्लीनिक का न होना जहां  इमरजेंसी और घर पर उन्हें अारम्भिक स्वास्थ सहायता प्राप्त कर सकते थे. अाज भी स्थिति नहीं बदली है. अाज क्लीनिक तो हैं पर उनमें अनुभव वाले डॉक्टर नहीं है और स्तर की उचित मूल्य पर सेवा नहीं उपलब्ध है. जब पिताजी को अक्समात समस्या होने पर मेडिकल कालेज पहुंचे तो घंटों वह डॉक्टर की प्रतीक्षा करते रहे न अाया की सेवा मिली न नर्स की सेवा मिली कोई सहायता उन्हें नहीं मिली अंत मेंं उन्होंने बहुत से घंटों के बाद अपने प्राण त्याग दिये।”

मेरे बड़े भाई श्री राजेन्द्र प्रसाद कलकत्ता से १५ अगस्त १९७० को घर छोड़कर साइकिल यात्रा पर निकल पड़े थे.  जहां उनके मित्र गोपाल पांजा ( जो उस समय  ४०/४ पुरानी लेबर कालोनी, ऐशबाग  पड़ोस मेंं रहते थे) और कलकत्ता मेंं अपनी बड़ी बहन तथा  पूर्व मेयर मिहिर सेन से सहायता दिलाई थी.  बड़े भाई भारत से नार्वे साइकिल से विश्व यात्रा करने निकले और नार्वे अच्छा लगा फिर यहीं रह गये.  कलकत्ते से मुम्बई तक साइकिल से मुम्बई से बसरा(ईराक) तक पानी के जहाज से पहुँचे थे. बसरा से टर्की, सीरिया, यूगोस्लाविया, ग्रीस, जर्मनी होते हुए नार्वे अाये थे. बचपन मेंं वह भी कविता कहानी लिखते थे. परन्तु अब उन्हें साहित्य अथवा सामाजिक कार्यों मेंं रूचि नहीं है.
बड़े भाई विदेश (नार्वे) मेंं रहते हैं, जैसा मैने पहले लिखा है. उन्होंने लखनऊ मेंं भी अलग अपना घर बना लिया है. वह जब भारत अाते तो अपने निजी घर मेंं रहते थे तो पिताजी उनसे कुछ नहीं कहते थे बेशक मेरी मां बहुत परेशान रहती थीं क्योंकि उन्होंने उनके साइकिल टूर करते समय सप्ताह दो-दो दिनों तक ईश्वर पर विश्वास करके वृत रखतीं थीं कि मेरे बड़े भाई को कोई नुकसान नहीं पहुंचे और वह सलामत रहें।

मिठाई और पान खाने के शौक़ीन
मेरी बड़ी बुआ रामरती जी ने बताया, “भाई साहेब मिठाई खाने के बहुत शौक़ीन थे. मेरे बाबा उनके लिए हमेशा मिठाई लेकर आते थे. तभी से वह शौक़ीन हो गए थे. वह विनम्र स्वभाव के मृदुभाषी थे. वह हमको बहुत मानते थे. वह सभी भाई -बहनों को आदर देते थे. पिताजी पान और  तम्बाकू खाने के बहुत शौकीन थे. वह पान खुद लाते थे और  खुद उसे  लगाकर खाते थे.”
वैसे भी लखनऊ मेंं पान खाने के बहुत से शौकीन लाग मिल जायेंगे इसीलिए जगह-जगह पान की दुकानें हैं.
रेलवे कारखाने में इन्सपेक्टर
मेरे पिता  डॉ बृजमोहनलाल शुक्ल रेलवे कारखाने में इन्स्पेक्टर थे. वह अारा शाप मेंं थे जहां वह लकड़ियों की जांच करते थे और अन्य इंस्पेक्शन करते थे.
मैंने भी इसी रेलवे कारखाने (सवारी और मालडिब्बा कारखाना आलमबाग, लखनऊ) में साढ़े सात साल काम किया है सन १९७२ से २० जनवरी १९८० तक. मैं  शाप बी मेंं काम करता था जिसमें मालडिब्बे की मरम्मत होती थी, डिब्बे मेंं खराब हिस्से को काटकर निकाल दिया जाता था और  उसमें छोटे-बड़े मोटी लोहे की चद्दर के पैच रिवीटर के जरिए लगाये जाते थे. हम लोग बड़ी चादरें  बड़े कटर से कटवाते थे उसको दोनो ओर सूराख करते थे जिसे रिविट (लोहे के बोल्ट को बहुत गरम लाल  करके) जड़ते थे. ऐसी अावाज अाती थी जैसे बड़ी मशीनगनें चल रही हों. इस प्रक्रिया मेंं  जलते हुये लोहे के कण हाथ, गर्दन, सर  अादि पर  पड़ते थे और  जला देते थे.
अक्सर लोहे से कटने के कारण जगह जगह निशान बान जाते थे जिससे अक्सर टिटनेस का इंजेक्शन लगता था ताकि इंफेक्शन न हो जाये।
मुझे स्मरण है कि हम जब रेलवे में काम करते थे तो पिताजी और मेरा खाना साथ लाते थे. मध्यावकाश के समय एक घंटे का अवकाश होता था. पिताजी मुझे पराठे अंगीठी में सेंक कर देते थे. बहुत सुखद लगता था.  मैं उनके पास दस मिनट पहले आ जाता था और दोपहर का लंच  करके  इस एक घंटे के अवकाश में वहां मजदूरों के पुस्तकालय में अखबार-पत्र-पत्रिकायें पढ़ने जाया करता था उससे मुझे बहुत सुकून मिलता था.

चिकित्सक के रूप में सेवा
डॉ बृजमोहन लाल शुक्ल समाजसेवी के तौर पर चिकित्सक थे. रजिस्टर्ड मेडिकल प्रेक्टिशनर थे अतः वह डाक्टर के तौर पर सीमित काम सकते थे. वह मिल रोड मवैया, लखनऊ में गांधी मेडिकल हाल में शाम को रेलवे की नौकरी से लौटने के बाद प्रेक्टिस करते थे. उनके साथ कुछ वर्षों तक स्व श्री रामाश्रय त्रिवेदी जी भी बैठते थे. मेरे डिग्री कालेज के सहपाठी मित्र  नरेंद्र दुबे मवैया में अाज भी  रहते हैं जिनके घर के सामने मंदिर के प्रांगण में गांधी मेडिकल हाल हुआ करता था.
 त्रिवेदी जी की बहू और पोती अपने ननिहाल अलीगंज में रहती हैं जिनसे मिलने मैं होली २०१६ में संजय मिश्र के साथ गया था.
पिताजी के पास अक्सर पास पड़ोस के लोग अपनी बीमारी पर दिखाने  और दवा लेने  तथा  रिसिप्ट और मेडिकल लिखाने आते रहते थे. वह लोगों की  निशुल्क और कम पैसे में ही सहायता कर दिया करते थे.
मेरे पिता मुझे चिकित्सक और मेरे बड़े भाई को इंजीनियर बनाना चाहते थे पर ईश्वर को और ही मंजूर था मैं पत्रकार और लेखक बन गया और बड़े भाई चिकित्सक बने तथा बीच वाले भाई श्री रमेशचन्द्र शुक्ल पुलिस (पी ए सी) मेंं कार्यरत रहे.
कोई काम बड़ा या छोटा नहीं होता
कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता यह मेरे पिता से सीखना चाहिये।  आर्थिक रूप से परेशान पिताजी ने किसी प्रकार के काम करने में कोई शर्म नहीं की और मेरी माँ ने उनका भरपूर साथ दिया।
पहले मेरे पिता मिल रोड मवैया, लखनऊ में गांधी मेडिकल हाल में चिकित्सा की प्रेक्टिस करते थे जिससे उन्हें कुछ आय भी हो जाती थी पर अपने मित्र  श्री रामाश्रय त्रिवेदी जी के अनुरोध पर मेरे पिता ने न चाहकर भी त्रिवेदी जी की सहायता के लिए  गाँधी मेडिकल हाल और प्रेक्टिस छोड़कर उन्हें सौंप दी थी. उसके बाद उन्होंने क्या-क्या नहीं किया।
अपनी नौकरी के बाद पार्टटाइम राखी-कोयले के काम मेंं मॉ की मदद करते और  रेलवे मेंं अपने मित्रों को लाटरी के टिकट बेचकर अपना जेबखर्च चलाते थे।  कभी-कभी पिताजी मुझे भी लखनऊ के ओडियन सिनेमा के पास ‘अग्रवाल लाटरी’ से लाटरी के टिकट खरीदने के लिए भेजते थे. वह भांग का सेवन भी करते थे और उन्हें विश्वास था कि मैं भांग का सेवन नहीं करता और न करूंगा अतः वह मुझे बचपन में नाकाहिंडोला, लखनऊ में भांग लेने भेजते थे.

समाजसेवी
मेरे पिताजी के चिरपरिचितों ने बताया कि पुरानी श्रमिक बस्ती ऐशबाग, लखनऊ में पुराने लोग सभी याद करते हैं. वह निस्वार्थ भाव से  सेवा करते थे और किसी की भी पीड़ा को सुनकर दुखी होते थे और उसके साथ चल देते थे जबकि वह स्वयं गरीब थे.
पिताजी के बारे में मैंने प्रतिष्ठित व्यक्ति और मेरे पिताजी के समकालीन श्री चावला जी से बात की जो ४८/५ पुरानी  श्रमिक बस्ती में रहते हैं और रेलवे से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं.  श्री चावला जी ने बताया कि आपके पिताजी बहुत शालीन व्यक्ति थे. जब डॉ बृजमोहन जी यहाँ  कोआपरेटिव सोसाइटी, पुरानी लेबर कालोनी में मंत्री चुने गये थे तब उनसे अक्सर मिलना होता था. चुनाव के पहले भी मेरे पास आये थे. वह श्री शोभनाथ सिंह जी के मित्र थे और उनका भी बहुत सम्मान करते थे जो कभी इसी सोसाइटी में अध्यक्ष चुने गये थे और यहाँ के सम्मानित व्यक्ति थे.  मैंने श्री चावला जी से एक अन्य समाजसेवी श्री भगत जी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वह उन्हीं के ब्लाक में नीचे वाले घर में रहते हैं. मैं भगत जी से मिलने गया और प्रणाम किया और उन्हें बचपन में ईमानदारी और दया की शिक्षा देने के लिए धन्यवाद दिया और आभार व्यक्त किया।  पता चला है कि अब भगत जी नहीं रहे उन्हें सभी बच्चे और युवा पापा जी कहकर पुकारते थे. भगत जी ने पूरी कालोनी में वृक्षारोपण, सत्य बोलना और जीवों पर दया करना सिखाया था और उनके द्वारा लगाये हुए कुछ पेड़ आज भी उनकी याद दिलाते हैं.
पिताजी छुआछूत नहीं मानते थे
मैंने बचपन में देखा था कि वह छुआछूत नहीं मानते थे. यदि मैं हिन्दू धर्म के अलावा किसी धर्म के कार्यक्रमों में कभी जाता तो उसका कभी भी बुरा नहीं मानते थे जबकि मेरी दादी गधा छू जाने के बाद और शमशान से वापस आने के बाद बिना नहाये घर में घुसने नहीं देती थीं चाहे कितना जाड़ा क्यों न हो. उस समय गरम पानी से नहाने का चलन नहीं था अतः ठन्डे पानी से नहाने में बहुत जाड़ा लगता था.

हर धर्म के मित्र
पिताजी के हर धर्म के मित्र थे. हिन्दू, मुस्लिम और सिख सभी धर्मों से उनके मित्र थे. ईदगाह के पास घर होने की वजह से उनके मित्र ईद और बकरीद के दिन जब नमाज पढ़ने के लिए ईदगाह अाते थे तो पहले वे अपनी साइकिलें और स्कूटर खड़ी करने आते थे.
जब उन्होंने ८-मोतीझील पर दुकानें बनवाईं तब उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम दोनों को ही दुकाने किराये पर दीं थी. तथा जिन्हें लोग छोटी जाति  का समझते थे पिताजी मेरी तरह उनके साथ-उठने बैठने में कोई परहेज नहीं करते थे. बचपन में पिताजी हर साल २४ घंटे के लिए अखण्ड रामायण का पाठ अपने घर पर रखते थे और दूसरों के घर भी पढ़ने स्वयं भी जाते थे और हम लोगों को भी भेजते थे.
बाद में उनका कहना था कि रामायण पाठ से ज्यादा जरूरी किसी की मदद करना और सेवा करना है.

Fritt ord Honnør 2016 tildeles Loveleen Rihel Brenna og Walid al-Kubaisi

Loveleen Rihel Brenna og Walid al-Kubaisi får Fritt Ords Honnør

Fritt Ords Honnør tildeles Loveleen Rihel Brenna og Walid al-Kubaisi for deres innsiktsfulle bidrag i norsk offentlighet i to tiår, ikke minst med innspill i innvandrings- og integreringsdiskusjoner. De har deltatt på sekulære (ikke-religiøse) premisser, og bidratt til nyansering og vitalisering av mangfoldsdebatten.

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मेरी महिला मित्रों ने माँ किशोरी देवी को आधुनिक बनाया

   सुरेशचन्द्र शुक्लशरद आलोक160214-Mataji-ke-saath

लेखक अपनी माँ किशोरी देवी के साथ 

मेरी माँ का जन्म ५ अप्रैल को छोटी बकौली (बकौली खुर्द) पोस्ट कठारा जिला कानपुर में हुआ था और मृत्यु २५ मार्च २००९ को लखनऊ में हुई थी.

मेरे युवा समय के मित्र स्व दिनेश पोरवाल, रमेश कुमार और स्व विजय सिंह का कहना था कि मेरी महिला-सहयोगी (मित्रों) और सभी धर्म के मित्रों के कारण मेरी माँ आधुनिक हो गयी थीं. माँ दकियानूसी ख्याल छोड़कर दृष्टिकोण में उदार हो गयी थीं.

आज तो काफी कुछ बदल गया है. आइये आपको अपने बचपन में ले चलते हैं.

ऐशबाग पुरानी लेबर कालोनी और भदेवां मोहल्ले में एक सड़क का नामकरण हुआ है जिसका नाम है एस एन मिश्र मार्ग। एस एन मिश्र (शिव नारायण मिश्र) जी मेरे पिता के मामा की पहली पत्नी के पुत्र थे और भदेवां, लखनऊ में रहते थे. वह मेरी माँ और पिताजी की बहुत इज्जत करते थे. जब उनके पिता उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते थे तो मेरी माँ और पिताजी उनका साथ तो देते ही थे बल्कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए माधयम बनकर सहायता करते थे. आज उनका बेटा संजय जिसे लोग गुल्लू मिश्रा श्रमिक नेता नाम से भी जानते हैं भदेवां में रहता हैं. Continue reading

पुनः स्पाइल डाट एनऊ पर पुनः स्वागत है

दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों, शुभचिंतकों, नेताओं  और लेखकों आपका पुनः स्पाइल डाट एनऊ (www.speil.no) पर पुनः स्वागत है. अपनी प्रतिक्रयायें, शुभकामनायें और रचनायें भेजिये। विदेशों से भेजी रचनाओं को प्राथमिकता दी जाती है. आपका -सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ ओस्लो, नार्वे speil.nett@gmail.com

अमेरिका, कनाडा, यूरोप और आस्ट्रेलिया में प्रवासी भारतीयों ने अपनी-अपनी तरह मेहनत करके अपना और देश का नाम रोशन किया है. लेटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिका) और महान अफ्रीका महाद्वीप में भी भारतीयों का बहुत योगदान है. कृपया आप अपनी सुख-दुःख की बाते हमसे साझा कीजिये। अपनी तरक्की और उपलब्धियों की खुशियां पात्र और आपबीती लिखकर सभी के साथ साझा कीजिये। धन्यवाद
-सम्पादक Speil ‘स्पाइल-दर्पण’ और www.speil.no